यह अच्छा है कि किसी काम को करने से पहले उसकी पूर्व योजना बना ली जाए। अक्सर योजना बना लेने से कार्य संपादन में सुभीता हो जाता है। किसी काम को करने में क्या अड़चनें आ सकती हैं, किन-किन चीजों की जरूरत पैदा हो सकती है- इसका अनुमान योजना बनाने से ही लग सकता है। सरकारें भी बड़े कामों को अंजाम देने से पहले उस बारे में विस्तार से योजना बनाती हैं। कहा भी जाता है कि बिना विचारे, बिना योजना बनाए किए जाने वाले काम अंतत: बिगड़ ही जाते हैं। अतीत के अनुभवों और भावी आकलनों के आधार पर बनने वाली योजना के सार्थक पक्षों की कमी नहीं है, पर क्या योजना वास्तव में किसी काम की संपूर्णता की गारंटी है? कई बार तो यह होता है कि लोग हमेशा योजना ही बनाते रह जाते हैं। या योजना में इतने उलझाव पैदा हो जाते हैं कि उस काम को स्थगित ही कर दिया जाता है। एक योजना बनाने के बाद लगता है कि इससे अच्छा होता कि कोई दूसरी योजना बना ली जाती। योजना बनाने से कोई काम मशीनी भी लगने लगता है, उसमें अप्रत्याशित परिणाम की संभावना खत्म हो जाती है, इसलिए योजना के मुताबिक काम संपन्न होने पर लोग खुशी से नहीं उछलते, बल्कि महज संतोष व्यक्त करके रह जाते हैं ।