सच से दोस्ती

हमारे आसपास हर कोई सच की तलाश में जुटा लगता है। महान संत, ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि वे सत्य की खोज में हैं। एक आम इंसान भी अपने भूत-भविष्य का सच जानने को बेताब दिखता है। सवाल है कि क्या हम वास्तव में सच जानना चाहते हैं? खरा सच कौन सुनना चाहता है? जब सच कड़वा हो, तो वह असहनीय हो जाता है।

यह भी एक सच है कि हम सच के नाम पर सिर्फ उतना सच जानना चाहते हैं, जिसमें हमारे अशुभ की कोई बात न हो। बल्कि, यह कहें कि सच के नाम पर हम में से ज्यादातर अहं को तुष्ट करने वाला झूठ सुनना पसंद करते हैं। हम मन ही मन झूठ या छल में कोई आसरा ढूंढते हैं। चूंकि, कई बार सत्य हमारी अपेक्षाओं से ठीक उलट होता है, इसलिए हम उससे बचने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। कोई असुंदर व्यक्ति आईना देखे, तो इसकी कम ही संभावना है कि वह आईने में दोष न निकाले। चित्रकार यदि किसी कुरूप शहंशाह का वास्तविक चित्र बना दे, तो क्या मजाल, जो चित्रकार की जान बख्श दी जाए। हम सच सुनें, खरे सच को सहन करें, तो शायद हमारा जीवन ही उलट जाए।

संजय वर्मा

One Response

  1. संजय जी आपकी बातें और विचार बहुत मंजे हुए लग रहें हैं। आपके विचार पढ़कर बहुत अच्छा लगा ।

    लगता है कि लोगों को आपके ब्लाग (चिट्ठे) के बारे में अभी पता नहीं है। आप अपने ब्लाग की सूचना हिन्दी के किसी ब्लाग एग्रीगेटर, यथा- नातद, ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत आदि को दे दें तो अपने-आप लोगों को पता चल जायेगा। इसके बाद आपके हर लेख पर टिप्पणियों की बरसात होगी।

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