जो कह न सका

हम बहुत कुछ कहना चाहते है | रोज हमारे भीतर नई-नई बातें जन्म लेती रहती है | कई बाते ऐसी भी होती है जिन्हें हम किससे कहे, हमे पता नही होता, फिर भी हम उन्हें वयक्त करने की इच्छा रखते है | सोची गई अधिकतर बाते कह दी जाती है लेकिन उससे कई गुना ज्यादा बाते ऐसी होती है, जो नही कही जाती | अगर हिसाब लगाया जाए तो जीवन मे अनकही ज्यादा है | भय, संकोच, दुविधा, उलझन, मर्यादा और न जाने कितनी दीवारे है बातो के रस्ते मे | ये दीवारे अपने आप नही खड़ी हो गई, इनमे से बहुतो को बनाया गया एक योजना के तहत | कई बार तो कोई आदमी जीवन के आखरी क्षणॉ मे अपने मन की बात कह पता है | बहुतो को ये सौभाग्य भी नसीब नही होता | शायद यह मानव सभ्यता पर एक कड़ी टिपण्णी है की हमारे जीवन मे अनकही बाते ज्यादा है | जरा कल्पना करे की एक दिन सारी अनकही बातें अचानक सामने आ जाएँगी | तब हो सकता है व्यवस्था का ताना-बाना ही बदल जाए, सरे सम्बन्ध फिर से कायम हो और रचा जाए जीवन का समीकरण फिर से |

संजय कुन्दन

There are no comments on this post

Leave a Reply