हमारे आसपास हर कोई सच की तलाश में जुटा लगता है। महान संत, ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि वे सत्य की खोज में हैं। एक आम इंसान भी अपने भूत-भविष्य का सच जानने को बेताब दिखता है। सवाल है कि क्या हम वास्तव में सच जानना चाहते हैं? खरा सच कौन सुनना चाहता है? जब सच कड़वा हो, तो वह असहनीय हो जाता है।
यह भी एक सच है कि हम सच के नाम पर सिर्फ उतना सच जानना चाहते हैं, जिसमें हमारे अशुभ की कोई बात न हो। बल्कि, यह कहें कि सच के नाम पर हम में से ज्यादातर अहं को तुष्ट करने वाला झूठ सुनना पसंद करते हैं। हम मन ही मन झूठ या छल में कोई आसरा ढूंढते हैं। चूंकि, कई बार सत्य हमारी अपेक्षाओं से ठीक उलट होता है, इसलिए हम उससे बचने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। कोई असुंदर व्यक्ति आईना देखे, तो इसकी कम ही संभावना है कि वह आईने में दोष न निकाले। चित्रकार यदि किसी कुरूप शहंशाह का वास्तविक चित्र बना दे, तो क्या मजाल, जो चित्रकार की जान बख्श दी जाए। हम सच सुनें, खरे सच को सहन करें, तो शायद हमारा जीवन ही उलट जाए।
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यह अच्छा है कि किसी काम को करने से पहले उसकी पूर्व योजना बना ली जाए। अक्सर योजना बना लेने से कार्य संपादन में सुभीता हो जाता है। किसी काम को करने में क्या अड़चनें आ सकती हैं, किन-किन चीजों की जरूरत पैदा हो सकती है- इसका अनुमान योजना बनाने से ही लग सकता है। सरकारें भी बड़े कामों को अंजाम देने से पहले उस बारे में विस्तार से योजना बनाती हैं। कहा भी जाता है कि बिना विचारे, बिना योजना बनाए किए जाने वाले काम अंतत: बिगड़ ही जाते हैं। अतीत के अनुभवों और भावी आकलनों के आधार पर बनने वाली योजना के सार्थक पक्षों की कमी नहीं है, पर क्या योजना वास्तव में किसी काम की संपूर्णता की गारंटी है? कई बार तो यह होता है कि लोग हमेशा योजना ही बनाते रह जाते हैं। या योजना में इतने उलझाव पैदा हो जाते हैं कि उस काम को स्थगित ही कर दिया जाता है। एक योजना बनाने के बाद लगता है कि इससे अच्छा होता कि कोई दूसरी योजना बना ली जाती। योजना बनाने से कोई काम मशीनी भी लगने लगता है, उसमें अप्रत्याशित परिणाम की संभावना खत्म हो जाती है, इसलिए योजना के मुताबिक काम संपन्न होने पर लोग खुशी से नहीं उछलते, बल्कि महज संतोष व्यक्त करके रह जाते हैं ।
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ऊपर से बेहद गंभीर दिखने वाला व्यक्ति कई बार ऐसे व्यवहार कर बैठता है जो उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता। हमें उसकी सरलता उसकी अगंभीरता लग सकती है। हर शख्स में कुछ न कुछ विचित्रताएं होती हैं। कोई किसी मामले में विचित्र होता है तो कोई किसी मामले में। संभव है एक पहुंचा हुआ विद्वान खाने को लेकर बच्चों जैसी ललक दिखाए या कोई वैज्ञानिक किसी पोशाक के प्रति कमजोरी दिखाए। लेकिन यही दुर्बलताएं मनुष्य को प्रामाणिक बनाती हैं।
ये साबित करती हैं कि किसी व्यक्ति में मनुष्यता बची हुई है, उसके ज्ञान ने उसकी सहजता नष्ट नहीं की है। कल्पना करें कि हर व्यक्ति एक जैसा व्यवहार करने लगे, हर आचरण पूर्वनिर्धारित हो। तब दुनिया बड़ी नीरस हो जाएगी। यह एक भयावह स्थिति होगी। सच पूछा जाए तो विचित्रताओं में कुछ भी विचित्र नहीं है। वही सहज है, वही वास्तविकता है। बाकी तो सब कुछ ओढ़ा गया है।
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हर आदमी चाहता है कि उसे काम के बोझ से छुटकारा मिले, वह थोड़ा निश्चिंत रहे। निश्चिंतता को लेकर भी हर आदमी की अपनी अलग-अलग कल्पना होती है। कोई सोचता है कि वह निश्चिंत होते ही खूब सोएगा। कोई घूमना चाहता है, तो कोई लिखना-पढ़ना।
लेकिन आदमी निश्चिंत होने को ढंग से परिभाषित नहीं कर पाता। काम के बोझ से छुटकारा मिलते ही वह ऐसे उपक्रम में लग जाता है, जो एक समय फिर बोझ में बदल जाता है। खाली बैठा हुआ एक आदमी अपने खालीपन से ही ऊब जाता है और दौड़कर अपनी व्यस्तता को गले लगा लेता है। असल में निश्चिंत होना आदमी की फितरत है ही नहीं। मानव सभ्यता को आलसियों ने यहां तक नहीं पहुंचाया। हर आदमी अगर आलसी होता और निश्चिंत बैठ गया होता, तो शायद जीवन यहां तक नहीं पहुंच पाता।
मनुष्यता तब पेड़ पर आराम फरमाती रह जाती। मनुष्य अपने लिए खुद ही चुनौतियां खड़ी करता है और उन्हें जीतने में जुटा रहता है। निश्चिंत तो वह थोड़े समय के लिए होना चाहता है, ताकि अगला कोई लक्ष्य सोच सके।
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दोस्ती की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। आज तक मनोवैज्ञानिक भी इस बारे में किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं। एक विचार यह है कि दोस्ती आत्मा के स्तर पर होती है। बच्चों में बड़ी जल्दी दोस्ती हो जाती है क्योंकि वे निश्छल होते हैं, लेकिन बड़ों में समझदारी आ जाती है, इसलिए उनकी दोस्ती भी नकली होती है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि एक जैसी रुचि रखने वाले या एक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से दोस्ती हो जाती है। पर इसे मित्रता कहना ठीक नहीं होगा। यह साहचर्य से उपजा संबंध है जिसमें वह निश्छलता या एक-दूसरे के लिए मर मिटने का भाव नहीं होता। बल्कि कई बार उलटा होता है। एक क्षेत्र के लोग साथ रहते हुए भी प्रतिद्वंद्विता की भावना से ग्रस्त रहते हैं। साथ रहते हुए भी वे एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने की चाह रखते हैं। ऐसे में वह गर्मजोशी कैसे आ सकती है, जो सच्ची दोस्ती में जरूरी मानी जाती है। इसलिए अलग-अलग क्षेत्र के लोगों की दोस्ती में अधिक ऊष्मा होती है। इसलिए ज्यादा संभावना इस बात की है कि एक राजनेता का सबसे अच्छा दोस्त कोई लेखक हो या कोई डॉक्टर किसी इंजीनियर को सबसे करीबी मानता हो ।
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हमारे भीतर रोज अनेक इच्छाएं आकार लेती हैं और हम उन्हें स्थगित करते चलते हैं, न जाने किन दिनों के लिए। हम अपने को दिलासा देने के लिए एक समय तय कर लेते हैं कि अमुक वर्ष में अपनी किसी इच्छा के साथ जीएंगे। पर अमूमन ऐसा होता नहीं है। वह इच्छा फिर स्थगित हो जाती है किसी और काल के लिए।
अगर स्थगित इच्छाओं की सूची बनाई जाए तो पता चलेगा कि हमारे जीवन में बस एक-दो इच्छाएं ही साथ चल रही हैं, बाकी सब कुछ स्थगित है यानी एक व्यक्ति वह सब कुछ नहीं कर पा रहा है जो करना चाहता है। लेकिन टाल दी गई इच्छाएं हमारे जीवन से विदा नहीं होतीं। ऐसा नहीं है कि वह हमसे अलग कोई बसेरा बना लेती हैं। वह हमारे मन के किसी कोने में ही कुलबुलाती रहती हैं। हर आदमी रोजमर्रा के संघर्ष को झेलने के लिए अपने मन के कई सुंदर कोनों में आवाजाही करता रहता है। एक स्वप्नलोक हमेशा हमारे साथ चलता है। वह तनावों की तपिश में थोड़ी राहत देता है। यह स्वप्नलोक इन्हीं स्थगित इच्छाओं से बनता है।
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हम बहुत कुछ कहना चाहते है | रोज हमारे भीतर नई-नई बातें जन्म लेती रहती है | कई बाते ऐसी भी होती है जिन्हें हम किससे कहे, हमे पता नही होता, फिर भी हम उन्हें वयक्त करने की इच्छा रखते है | सोची गई अधिकतर बाते कह दी जाती है लेकिन उससे कई गुना ज्यादा बाते ऐसी होती है, जो नही कही जाती | अगर हिसाब लगाया जाए तो जीवन मे अनकही ज्यादा है | भय, संकोच, दुविधा, उलझन, मर्यादा और न जाने कितनी दीवारे है बातो के रस्ते मे | ये दीवारे अपने आप नही खड़ी हो गई, इनमे से बहुतो को बनाया गया एक योजना के तहत | कई बार तो कोई आदमी जीवन के आखरी क्षणॉ मे अपने मन की बात कह पता है | बहुतो को ये सौभाग्य भी नसीब नही होता | शायद यह मानव सभ्यता पर एक कड़ी टिपण्णी है की हमारे जीवन मे अनकही बाते ज्यादा है | जरा कल्पना करे की एक दिन सारी अनकही बातें अचानक सामने आ जाएँगी | तब हो सकता है व्यवस्था का ताना-बाना ही बदल जाए, सरे सम्बन्ध फिर से कायम हो और रचा जाए जीवन का समीकरण फिर से |
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बात को उल्टा क्यों कहा जाए? आम चलन तो यह है की बात हो सीधी और सरल, ताकि समझ मे आए और जो कहा जा रहा है, उसका वही मतलब निकले, जिस सन्दर्भ मे उसे कहा गया है | पर भाषा का इतिहास बताता है तमाम बातो को उल्टा कहने सुनने की जो परम्परा है, वह सदियों पहले ही विकसित हो गई थी | कबीर जैसे अनेक समाज सुधारक बहुत पहले इस बात का मर्म जान गए की सीधी-सरल बात पर लोग कान नही देते | सीधी बात को लोग सिर्फ़ इसलिए अनसुना नही करते क्युकि उसे तो जमाने से इसी तरह कहा जाता रहा है, बल्कि वे चाहते है की बात मे कुछ रस भी मिले | सीधी बात मे वह रस कहा मिलता है, जो रस बात को थोड़ा घुमा फिरा कर कहने मे है | उलटी बात के असली अर्थ गरहन करने मे दिमाग पर थोड़ा जोर देना पड़ता है | जिस बात के असली अर्थ रहस्ये को जानने मे कोई जुगत भिडानी पड़ती है, उस बात को सुनकर तबियत जरा हरी हो जाती है या दिल पर जरा छुरी सी चल जाती है | या कहे की उलटी बात की चपत लगते ही सही मायने मे अकल ठिकाने लग जाती है |
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